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एक ही फंडा था- बने रहो पगला, काम करेगा अगला…।

सुबह के साढ़े दस बज चुके थे। पत्रकार हरिराम अपनी उस रजाई के अंदर ठंड से नूराकुश्ती कर रहा था, जिसमें या तो सिर आ सकता था या फिर पैर। पत्नी चिंताबाई कबसे उससे कह रही थी, कि नई रजाई ले लीजिए। हरिराम ने वादा किया था इंक्रीमेंट के बाद ले लेंगे। लेकिन जब इंक्रीमेंट हुआ, तो होश फ़ाख्ता...
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