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व्यंग्य : चोखेलाल भी गरीब था, पर चोखा था

दफ़्तर में की-बोर्ड और दिमाग की दही करने के बाद जब हरिराम की खबर का संपादक ने रायता फैला दिया, तो हरिराम अपने मन ही मन उनकी माता-बहनों को याद करता हुआ दफ़्तर से झल्लाता हुआ निकला।

दरअसल, दिनभर यहां-वहां, इस दफ़्तर, उस दफ़्तर भटकने के बाद कलेक्टर मांगेलाल के चपरासी चोखेलाल ने दो कागज़ लाकर दिए थे, जिसमें लोकतंत्र की मां एक ग़रीब औरत ‘जनता’ के पैसे की लूट का सबूत था। चोखेलाल भी गरीब था, पर चोखा था। हरिराम से कहा कि भैया, जनता की बात सबको पता चलनी ही चाहिए। हरिराम ने वादा किया, चिंता मत करो…जनता की बात जरूर आएगी। अपने दिल, दिमाग में कलेक्टर मांगेलाल को ठीक करने का जज्बा लिए हरिराम दफ़्तर पहुंचा। डोकलाम विवाद के दौरान जिस तेजी से तोपों को बार्डर पर तैनात किया गया, कुछ उतनी ही तेजी से की-बोर्ड पर उंगलियां चलीं। खबरों का गोला तैयार हो गया संपादक तोपचंद के मुंह में जाने के लिए, मगर यह क्या…? तोप ने गोले को लेने से मना कर दिया…कहा, गोला ठीक नहीं बना। इसे ठीक करो…। खबर जो हरिराम ने बनाकर दी थी, कुछ ऐसी थी..

मांगेलाल ने जनता के पैसे लूटकर अपने घर में 40 एसी लगवाई

संपादक तोपचंद बोला- मांगेलाल से तो बात ही नहीं हुई। उनसे बात करो…हरिराम- ठीक है सर।

(हरिराम ने फोन पर कलेक्टर मांगेलाल से बात की। फोन पर हरिराम और मांगेलाल)

हरिराम- सर, नमस्कार। मैं भाग रे झंडू, आया तूफान…अखबार से हरिराम बोल रहा हूं।
मांगेलाल- बोलिए।
हरिराम- सर, एक शिकायत है कि आपने जनता के पैसे से 40 एसी खरीदे हैं अपने निवास में लगाने के लिए।
मांगेलाल- जनता की शिकायत झूठी है।
हरिराम- सर, हमें पता लगा है कि ये आपके तीन चार घरों में लगा दिए गए हैं।
मांगेलाल- सब आरोप बेबुनियाद है। आप आइए, चाय पर बात करेंगे।
फोन कट कर दिया। हरिराम संपादक के पास पहुंचा।

हरिराम- सर, मांगेलाल ने कहा कि सब बेबुनियाद है।
तोपचंद- तो फिर जनता आरोप क्यों लगा रही है। हमें यह देखना चाहिए?
हरिराम- सर, जनता से बात हुई है। उसका बेटा लोकतंत्र बीमार पड़ा है। अस्पताल में है। जिस संजीवनी कोष के लिए जनता मांगेलाल के पास गई थी, उसी से पैसा निकालकर ये एसी खरीदा गया है।
तोपचंद- हम्म्म! तो लोकतंत्र सरकारी अस्पताल में है। उसकी फोटो कराई?
हरिराम- हां सर, कराई है….बहुत बुरा हाल है बेचारे का।
तोपचंद- ठीक है, सरकारी डॉक्टर संता सिंह का वर्सन लो..कि उसे क्या बीमारी है?
हरिराम- ठीक है सर।
(हरिराम ने संता सिंह से बात की और फिर तोपचंद के पास आया, तब तोपचंद के पास किसी का फोन आ गया था। फोन कट होने के बाद)
हरिराम-सर, डॉ. संता सिंह ने कहा कि आपसे बात करते हैं।
तोपचंद- हां, उन्हीं का फोन था। वो तो बता रहे हैं कि लोकतंत्र को जनता ने जबरन भर्ती करा दिया है, ताकि जनता संजीवनी कोष से पैसे ऐंठ सके।
हरिराम- नहीं सर, हमारे पास तो एसी के आर्डर की कॉपी, घरों में लगे हुए एसी की तस्वीरें और उनके पेमेंट की रसीदें हैं।
तोपचंद-लेकिन डॉक्टर लोकतंत्र ने जब लिखकर ही नहीं दिया कि लोकतंत्र बीमार है, तो जनता संजीवनी का पैसा मांगने क्यों गई थी…
संपादक ने हरिराम को चिल्लाया….कहा, बेवकूफ, खबर बनाने नहीं आती। झक मार रहे हो, इतने साल से पत्रकारिता में..देखो खबर ऐसे बनती है…अंतत: खबर की हेडिंग फिर ऐसी हो गई…

story by yashwant gohil cg
संजीवनी का पैसा खाने जनता ने अपने बेटे लोकतंत्र को बनाया बीमार
इसी को देखकर हरिराम रात को की-बोर्ड पटकता हुआ बाहर निकल रहा था क्योंकि उसने चपरासी चोखेलाल को वादा किया था कि जनता की आवाज जरूर छापेंगे। झल्लाता हुआ बाहर निकल ही रहा था कि संपादक तोपचंद ने फिर बुलाया और कहा-
तोपचंद- हरिराम, कल मेरे नए मकान का गृहप्रवेश है। ये उसका कार्ड…प्रसाद लेने जरूर आना।
हरिराम- जी सर, थैंक्स…।

दूसरे दिन भाग रे झंडू, आया तूफान की लीड खबर थी…

संजीवनी का पैसा खाने जनता ने अपने बेटे लोकतंत्र को बनाया बीमार
चोखेलाल मांगेलाल के दफ़्तर में लोगों को पानी पिला रहा था, गाली खा रहा था कि कागज लीक कैसे हुआ? संपादक तोपचंद के यहां डा. संता सिंह भी आए हुए थे बड़ा सा बुके लेकर। हरिराम प्रोटोकॉल के तहत संपादक के नए घर में वीआईपी लोगों को अटैंड कर रहा था।
संपादक तोपचंद ने डा. संता सिंह ने पूछा-लोकतंत्र कैसा है?
संता सिंह ने हंसते हुए जवाब दिया- मर रहा है, बचना मुश्किल है। जनता कहां-कहां जाएगी उसे बचाने।
तभी संपादक तोपचंद के फोन की घंटी बजी। तोपचंद ने देखा, अरे यह कलेक्टर मांगेलाल का फोन है।
तोपचंद- जी सर, नमस्कार…
मांगेलाल- बधाई हो तोपचंद जी नए मकान की, मैं नहीं आ सका। कुछ काम आ गया…एसी ठीक काम कर रहा है न, कोई परेशानी हो, तो डीलर से कह रखा है एक्सचेंज करवा लीजिएगा…
तोपचंद- जी सर, बिल्कुल…शुक्रिया..
तभी उसकी नज़र दो कमरों में लगे एसी पर पड़ी। जिस एसी के पेमेंट की रसीद की कॉपी हरिराम की जेब में रखी थी, उन्हीं में से दो एसी संपादक के दो कमरों में लगी थी।

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लेखक : यशवंत गोहिल।

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