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ज़िक्र ए शोहदा ए कर्बला✒️- पार्ट-5

– दीं पनाह अस्त हुसैन –
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माहे शाबान की 3 तारीख 4 हिजरी यानी 8 जनवरी सन 626 ईस्वी को मदीना ए तैय्यबा में इमाम ए आली मकाम हुसैन रजियल्लाहू तआला अन्हु की विलादत हुई। हजरत अली और सैय्यदा फातिमज्ज़हरा रजीअल्लाह ताला अनहुमा के चेहरों की खुशियो को देख जिन्नो मलायक भी खुशी से झूम उठे ओर हुसैन को देखने रोज़ सुब्हो शाम आने लगे।

हुसैन को जी भरकर देखने के बावजूद उनका दिल ना भरता और फ़रिशते अपने रब से फ़रियाद करते ए मौला हमे एक नज़र और हुसैन की ज़ियारत करा दे। फरिश्तों की इस बेताबी को देख खुदा भी खुश हो उठता और जब वो अपने महबूब को देखता की उनका चेहरा हुसैन को देख कर खिल उठा है तो वो जो सारे जहां का मालिक है वो भी ख़ुश होकर कभी महबूब को देखता तो कभी महबूब के महबूब यानि हुसैन को देखता।

इस तरह अली और फातिमा के साथ साथ नबी ए करीम सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम भी बड़े लाड प्यार से अपने नवासे की तरबियत की।

इमामें हुसैन का अक़ीक़ा पैदाइश के सातवे रोज किया गया जिसमें एक दुंबा ज़िबाह किया गया।

इमामे हसन और इमाम हुसैन दोनो ही अपने नाना जान की आंखों के तारे थे। आप सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम दोनो नवासो से बेहद मोहब्बत करते थे। सहाबा भी आपकी खुशी में बराबरी से शरीक होते एक रोज़ जब दोनो ही आपके कांधो पर सवार थे तो सहाबा ने आपसे हसन हुसैन के नाम के बारे में जानना चाहा तो आपने फरमाया की मेरे हसन- हुसैन के नाम जन्नती नामों में से है।

हुज़ूर ﷺ‎ ने सहाबा से यह भी इरशाद फरमाया कि

जो चाहता है कि जन्नती जवानों के सरदार को देखे तो वो हसन हुसैन को देख ले |
(नूरुल अबसार,सफह 114 )

अपने आका की खुशी को देखकर सहाबा भी खुशी से झूम उठते। और इस तरह सहाबा भी अक्सर हसन हुसैन के चेहरों की जियारत करने आते और बेहद खुश होते।

दिन ऐसे ही गुजरते रहे। नवासे हुसैन को देखकर आका ए करीम को वो पल भी याद आया जब आका नबी ए करीम सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम अल्लाह से भी उनके रब ने एक सख्त इम्तेहान लिया था और बेटो की ज़िंदगी मांग लिया था ।

अल्लाह के हुक्म से जिब्रीले अमीन एक रोज़ आका ए करीम के पास तशरीफ़ लाए और फरमाया ‘

अए अल्लाह के रसूल रब तआला चाहता है की आज आपसे बेटे इब्राहिम(रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) और बेटी फातिमा के होने वाले बेटे यानि नवासे (हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) मे से किसी एक की ज़िंदगी का फ़ैसला आपकी मर्ज़ी से करना चाहता है।

जिबरीले अमीन ने बतलाया की इनमे से कोई एक बचपन मे ही ख़त्म हो जाएगा और दूसरे के बड़े हो जाने पर अल्लाह उनके सब्र का इम्तेहान लेगा ।

आका ए करीम अपने रब की रजा को समझ गए आपने फ़रमाया की ए जिब्रिल ए अमीन रब तआला से कह देना उसकी हर रजा पर मै राज़ी हूं वो जिसे चाहे चुन सकता है।

हज़रत जिब्रीले अमीन ने कहा इसका इख्तियार अल्लाह ने आपको दिया है और चाहता है की आप ही इसका फ़ैसला करे।

आक़ा ए करीम ﷺ‎ की आंखों के सामने बेटी फातिमा का चेहरा आ गया। भला वो हुसैन का गम अपनी आंखों के सामने कैसे बर्दाश्त कर सकेगी और अपनी बेटी को गमगीन वे भला कैसे देख सकते थे, लिहाजा हुज़ूर ﷺ‎ ने भी अल्लाह के फ़ैसले पर राज़ी होकर बतला दिया की अल्लाह चाहता है की उनका खानदान बेटो से नही बल्कि बेटियो से बढ़ेगा। और दीन की खातिर हुसैन को कुर्बानी देनी होगी इस बात को भी आका ने जान लिया था।
(शवाहिदुन नुबुवत,सफह 305)

आप समझ गए होगे की कर्बला मे जो होने वाला था उसे अल्लाह भी जानता था और अल्लाह का महबूब भी जानता था।

आइए अब आगे बढ़ते है ओर इमाम ए आली मकाम की जाहिरा जिंदगी को देखते है।

इमाम हुसैन जब छोटे थे और जब कभी वे रोते तो उन्हे रोता हुआ सिर्फ़ अम्मी फातिमा, बाबा अली और नाना आका ए करीम ही नहीं बल्कि अल्लाह रब्बुल आलमीन भी नहीं देख सकता था जब कभी इमाम हुसैन की वालिदा सैय्यदा फातिमा काम करती और हुसैन अकेले होते और वे अगर रोने लगते तो अल्लाह जिब्राइल अलैहिससलाम को हुक्म देता और फरमाता

‘ए जिब्राइल फ़ौरन जाओ और हुसैन को चुप कराओ । जिब्राइल अलैहिस्सलाम बिजली से भी ज्यादा तेजी से आते और हुसैन को झूला झूलाते और उन्हें चुप कराते ।

आपकी वालिदा सैय्यदा फातिमा भी फरमाती है की वो देखती की आसमान से घर तक नूर की चादर फैली हुई है और इस रौशनी में वो देखती की आसमान से हूरो मलायक उतरकर हुसैन की बलाए लेते नहीं थकते।

एक मर्तबा जब हसन और हुसैन दोनों काफ़ी छोटे थे तो दोनों ने ही एक-एक तख्तियां लिखी और अपनी अम्मी जान के पास आए और पूछा

ए अम्मीजान बताओ हम में से किसकी तख्ती ज्यादा अच्छी है।

मगर आपकी अम्मी सैय्यदा फातिमा कोई फैसला नहीं कर सकी क्योंकि वह जानती थी अगर वह हसन की तख्ती को अच्छा कहती तो हुसैन का दिल टूट जाता और हुसैन की तख्ती को अच्छी है कह देती तो हसन का दिल टूट जाता और दोनों ही तो फातिमा की आंखों के तारे थे लिहाजा वह दोनों बच्चों को हजरत अली के पास भेज देती है।

अपने बाबा हजरत अली से भी दोनो बच्चे मासूमियत से यही सवाल करते है। हजरत अली भी इसका फैसला नहीं कर पाते हैं ।और फ़िर वे अपने दोनों बेटों को उनके नाना जान के पास भेज देते हैं ।

इमाम हसन और हुसैन दौड़कर नानाजान के पास आते हैं नाना जान फ़ौरन आगे बढ़कर उन्हें अपनी गोद में बिठा लेते हैं और ख़ूब प्यार करते है वे यह भी जान लेते है की बच्चे आज किस मक़सद से आए है।

फिर हसन और हुसैन दोनों नाना जान से भी सवाल करते हैं

ए नाना जान हमने यह तख्ती लिखी है आप फैसला करें कि किसकी तख्ती ज्यादा अच्छी है ?

मगर आपके नानाजान भी इसका फैसला नहीं कर पाते है और आसमान की तरफ देखने लगते हैं इधर अल्लाह रब्बुल आलमीन भी यह सारा मंज़र देख रहा था । जब वह देखता है कि उसके महबूब भी फैसला नहीं कर सकते है तो रब तआला जिब्रील ए अमीन को फ़ैसला करने भेजता है।

जिब्राइल अलैहिस्सलाम इन्सानी शक्ल में तशरीफ लाते हैं नबी ए करीम उन्हें पहचान लेते हैं और हसन और हुसैन से कहते हैं कि ये आपका फैसला करेंगे आप इनसे पूछे।

जिब्राइल खुश होकर इमाम हुसैन को गोदी में बिठा लेते हैं । इमाम हुसैन उनकी दाढ़ी को खींचने लगते हैं। जिसे देखकर नबी ए करीम हुसैन को मना करते हैं तो जिब्राइल खुश होकर आका ए करीम से कहते हैं

हुज़ूर हुसैन जो करते हैं उन्हें करने दे । आप उन्हें न रोकें मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।

फिर वे अपने जेब से जन्नत से लाए हुए सात मोती निकालते है और फिर इमाम हसन और हुसैन की लिखी हुई तख्तियों को साथ साथ रखते हुए हसन और हुसैन से कहते हैं की

इसका फ़ैसला मै भी नही कर सकता आओ देखें कि अल्लाह इसका फैसला किस तरह से करता है।

फिर वो मोती उछालते हैं एक मोती इमाम हुसैन की तख्ती पर गिरता है तो दूसरा इमाम हुसैन की तख्ती पर इस तरह से 6 मोती में से तीन तीन मोती दोनों की तख्तियों पर गिरते है । इस मंजर को सारे लोग देख रहें है ज़मी वाले तो ज़मी वाले आसमान वाले भी इस फ़ैसले को देखने बेताब है जब सातवां मोती उछाला जाता है तो सभी देखते है की वह मोती दोनों तख्तियों के बीच में गिरकर टूट जाता है और इस मोती का आधा टुकड़ा हजरत इमाम हसन की तख्ती पर गिरता है और आधा टुकड़ा इमाम हुसैन की तख्ती पर गिरता है ।

जिस पर जिब्रील भी सुभान अल्लाह कह उठते है ओर कहते है।

अल्लाह भी इन बच्चो का दिल नहीं दुखा सकता है।

और फ़िर जिब्राइल फैसला करते हुए दोनों से कहते हैं की बेटे इमाम हसन और इमाम हुसैन आप दोनों ही की तख्ती बराबर है। सुभान अल्लाह

इसी तरह एक ओर वाक्या समाद फरमाए

एक मर्तबा हजरत उमर रज़ी अल्लाह तआला अन्हु जब खलीफा थे तो उनका बेटा अब्दुल्लाह जो कि इमाम हुसैन का हम उम्र था। दोनों में दोस्ती भी थी और अक़सर साथ में खेला करते थे। एक बार खेलते खेलते दोनों मैं तकरार हो गई ।

अब्दुल्लाह बिन उमर ने हुसैन से अपने बाबा का रौब दिखाते हुए कहने लगा कि मेरे बाबा उमर खलीफा है मैं उनसे शिकायत करूंगा।

तब हुसैन ने कहा की इससे क्या होगा तुम्हारे बाबा तो मेरे नाना के गुलाम है ।

यह बात बच्चे को चुभ गई और वह बच्चा रोता हुआ अपने बाबा के पास आता है और हुसैन की शिकायत करते हुए कहता है की हुसैन ने कहा कि तुम्हारे बाबा मेरे नाना के गुलाम हैं ।

जिसे सुनकर उमर मुस्कुरा उठते है और बेटे से पूछा क्या यह बात हुसैन ने कही है ?

बेटे ने जब हां कहा तो हज़रत उमर अपने बेटे का हाथ पकड़कर हुसैन के पास आते हैं और हुसैन को गोद में लेकर प्यार से पूछते हैं

बेटा हुसैन क्या तुमने बेटे अब्दुल्लाह से कहा की तुम्हारे बाबा मेरे नाना के गुलाम हैं ?

हुसैन ने निडर होकर मासूमियत से जवाब दिया की

हां मैंने यह कहा था की तुम्हारे बाबा मेरे नाना के गुलाम है।

उमर खुश होकर हुसैन के सिर पर हाथ फेरते हुए से प्यार से कहते हैं की

बेटा क्या तुम यह बात तम इस पर्ची पर लिख कर दे सकते हो।

हुसैन यह बात लिख कर हज़रत उमर को दे देते है ।

उमर ख़ुश होकर बेटे से कहते हैं चल बेटा आज तेरी वजह से उमर का काम बन गया।

हुसैन का लिखा दुनिया मे ही बल्कि महशर में भी तेरे बाबा के काम आएगा ।

वहां जब मेरा हिसाब किताब होगा तो मैं यह तख्ती दिखाकर कह दूंगा कि मैं सिर्फ़ अपने नबी का गुलाम ही नही हूं बल्कि मैं जन्नती जवानों के सरदार का भी गुलाम हूं और यही वसीला जन्नत में ले कर जाएगा। सुभान अल्लाह

आका ए करीम इमाम हुसैन को देखकर अक्सर तड़प उठते और उन्हें याद आ जाता वो लम्हा जब हुसैन की पैदाइश के बाद जिब्रील ए अमीन तशरीफ लाए थे और उन्होंने आप सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम को यह बात बतलाई थी की

आपका यह प्यारा नवासा दीन को बचाने की खातिर कर्बला में शहीद होगा। जिसे सुनकर आका के दिल पर क्या बीती होगी इसे शायद ही कोई और समझ सकेगा।

सिर्फ़ इतना ही नही जिब्रिले अमीन ने आका ए करीम को कर्बला की वो मिट्टी भी आपको दी थीं और बतलाया था की

ए अल्लाह के रसूल जिस दिन हुसैन शहीद होंगे यह मिट्टी भी खून आलूदा होकर लाल हो जाएगी।

नबी ए करीम सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम ने उस मिट्टी को आंखो से लगाया और एक शीशी में संभालकर रख लिया था।

आका ए करीम अक्सर आपने प्यारे नवासे को देखते तो कर्बला का मंज़र आपके सामने नमूदार हो उठता और फिर आप हुसैन को सीने से लगा कर तड़प उठते, और कभी कभी रोने भी लगते, मगर फातिमा के सामने आपने कभी इज़हार ना किया।

हजरत अली पर भी आपने कभी इज़हार नहीं किया मगर एक रोज़ आपकी आंखों में अश्को की बरसात को हज़रत अली ने भी देख ही लिया। और हुज़ूर को यूं रोता हुआ देखकर हजरत अली भी रोने लगे।

हज़रत अली ने नबी ए करीम ﷺ‎ से काफ़ी इसरार करते हुए रोने का सबब पूछा तो आपने हजरत अली को बतलाया की

बेटे हुसैन और उसका घराना दीन को बचाने की खातिर एक रोज़ मदीना छोड़कर जाएंगे और कर्बला में अल्लाह उनका इम्तहान लेगा। सभी को भूखा प्यासा रखा जाएगा और हुसैन शहीद हो जाएगा ।

अल्लाह अल्लाह सुनकर बाबा अली को कैसा लगा होगा, मगर बात दीन की हिफाज़त की थी, तो हज़रत अली ने आंसू पोंछ लिया और फरमाया

आका सिर्फ़ मेरा बेटा हुसैन ही क्या दीन की खातिर अली के घराने का एक एक फरजंद भी अगर शहीद जाएगा तब भी इससे बढ़कर बात और क्या होगीकी है कि अल्लाह ने इस अज़ीम कुर्बानी के लिए अली के घराने को चुना है ।

और इस तरह इमाम आली मकाम हुसैन अलैहिस्सलाम बड़े हो जाते हैं । आपकी शादी होती है । औलादे होती है।

इधर अमीर मुआविया का बेटा यजीद जो क्रूर फासिक और अय्याश और एक बदबख्त हैवान था । दीन ए इस्लाम और शरीयत उसके लिए क्या मायने नहीं रखता था इसे जानने के लिए एक वाक्या समाद फरमाए I

एक बार यजीद –पलीद दुनिया वालो को दिखाने की गरज से हज में रवाना हुवा मगर उसे हज से कोई वास्ता नहीं था वो तो तफरीह के लिए वहाँ गया था I दौराने हज वो मक्के शरीफ से मदीने मुनव्वरा पंहुचा I उसी साल हज में इमामे आली मकाम हुसैन अलैहिस्सलाम भी हज में गए हुवे थे I इमाम ए आली मकाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी ज़िन्दगी में 25 मर्तबा पैदल हज किये है I जब वो मदीने मुनव्वरा पहुचे तो अपने नाना जान की बारगाह में हाज़री दी I मदीने मुनव्वरा में जहाँ पर यजीद –पलीद रुका हुवा था उसी जगह से इमाम ए आली मकाम हुसैन अलैहिस्सलाम का भी गुज़र हुआ और इत्तेफाक से उनकी यजीद पलीद से मुलाक़ात हो गयी I

इमाम हुसैन ने सोचा की अमीर मुआवया का बेटा है, हज पर आया है चलो उससे भी मिल लिया जाये।

खुद रब भी चाहता था की यज़ीद –पलीद की करतूतों को और उसके झूठे ईमान को हुसैन भी अपनी आँखों से भ देख ले I

इस तरह जब आप उस यजीद -पलीद से अल्लाह के घर जैसी मुबारक जगह पर मिले तो भी आपने देखा की दौराने हज भी उस कमबख्त यजीद- पलीद के हाथ में शराब का गिलास था I यू अचानक अपने सामने इमामे ए आली मकाम हुसैन अलैहिस्सलाम को देखकर वो पलीद घबरा गया और शराब का गिलास छुपाने लगा, मगर इमाम ए आली मकाम ने सब कुछ देख भी लिया और सारा माजरा समझ भी लिया I

तब नशे में बदबख्त उस यजीद –पलीद ने इमामे आली मकाम से कहा

“अए हुसैन.. अब जबकि तुमने सब कुछ अपनी आँखों से देख ही लिया है और हमारे बारे में सब कुछ जान ही गए हो तो अब तुमसे क्या छुपाना । मै ये चाहता हूँ की तुम मेरा साथ दो, इसके बदले मे जो कुछ भी तुम चाहोगे वो मै तुम्हे दूंगा दुनिया का हर एशों आराम तुम्हें हासिल होगा I

आपने जवाब दिया

“अए बदबख्त मैंने तेरे बारे में जो कुछ सुना था उसे आज अपनी आँखों से देख भी लिया है I ये हुसैन आज तुझे ताकीद करता है की तू अपनी हरकतों से बाज़ आ जा वरना तुझे, जहन्नम की आग से कोई नहीं बचा सकता है ” I

जिसे सुनकर यज़ीद तिलमिला उठा I

इस वाकये के बाद से ही यजीद ने कुछ को तो लालच देकर और कुछ को डरा धमका कर अपनी तरफ करने की कवायद शुरू कर दी थी I

और इस तरह 10 साल ख़त्म होने से 6 महीने पहले जबकि अमीर मुआविया का भी इन्तेकाल हो गया था और शर्त के मुताबिक इस्लामिक हुकूमत अब हजरत ईमाम ए हुसैन को दी जानी चाहिए थी I मगर यज़ीद पलीद को तो अब अय्याशी की आदत पड़ चुकी थीं लिहाज़ा उसने लोगो को लालच देकर अपने कब्जे में करने की कवायद तेज़ कर दी और तक़रीबन 18000 लोगो का लश्कर बनाकर हाकिम बन बैठा।

उसने मक्के मदीने को नही चुना बल्कि मौजूदा इराक़ के दमिश्क को चुना ताकि कोई उसकी खिलाफत ना कर सके। मगर वो यह भी जानता था की इमाम हुसैन उसके शासन के लिए सबसे बड़ा खतरा है लिहाज़ा उसने इमाम हुसैन से दुश्मनी की सारी हदे पार कर दी थी I

यजीद इस्लाम और दींन से कोसो दूर था I हर वक्त वो अइयाशियो में डूबा रहता था I जुवां और शराब का वो खुद भी शौकीन था तो दूसरो को भला कैसे मना करता I यहाँ तक की “सौतेली बहनों” और ‘सौतेली माँओ” तक से उसने गलत हरकते करने की ख्वाहिश रखता था I उसके बारे में तो यहाँ तक भी कहा गया की वो “लडको” “कुत्तो”और “जानवरों” तक से नशे में बदफेली किया करता था I

उस फ़ासिद ने ईमाम हुसैन के खिलाफ खुलकर बगावत और दुश्मनी का एलान भी कर दिया था ।

यज़ीद ने अपनी फ़ौज का डर लोगो के दिलो में बैठाने की गरज से क्रूरता पूर्वक व्यवहार किया और लोगो को अपने हाथ पर बैत करने मजबूर किया ।

और फिर इसके बाद इमाम ए आली मकाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पास भी उस गुस्ताख ने पैगाम भेजा की वे भी यज़ीद के हाथो पर बैत करे।

मगर इमाम ए आली मकाम हुसैन को ये कब मंज़ूर था I कहाँ इमाम हुसैन, शेरे खुदा इमाम ए अली मुर्तुजा और फ़तिमाज़्ज़हरा रदीअल्लाहू तआला अन्हों के बेटे और कहाँ यज़ीद-पलीद जो अपने बाप की मौत के बाद बादशाह बन बैठा था जो एक फ़ासिक़ क्रूर और अय्याश तो था ही बल्कि उससे कही जियादा वो दीन का भी दुश्मन था I जो इस्लामिक कानून कायदे बदल कर अपने नियम कायदे बनाना चाहता था किन्तु इमाम हुसैन का मर्तबा वह भली भांति जानता था इसलिए उसने उनके पास पैगाम भेजा की तुम्हे मेरे हाथो पर बैअत होना पड़ेगा और इमाम हुसैन ने उस फ़ासिक की इस बात को मानने से इन्कार कर दिया।

इमाम ए आली मक़ाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पास यज़ीद के पैगाम लगातार आते रहे जिसमे एक ही बात कही जाती थी की वो यजीद की हुकूमत को स्वीकार करते हुवे उससे बैत कर ले । मगर ये हुसैन को कभी मंजूर न था इसलिए हुसैन ने जब सारे पैगाम ठुकरा दिये तो फिर इमाम हुसैन को एक बार वलीद ने दरबार मे बुलाकर भी यही बात कही जिसे सुनकर आप गुस्से मे आकर कहा की

यजीद से कह देना की हुसैन कभी उस ज़ालिम के हाथो पर बैत नहीं करेगा ।

जिसे सुनकर मरवान जो आपका पहले से ही दुश्मन था उसने वलीद से कहा की

तुम हुसैन को मौका मत दो और अभी खत्म करके हुसैन का सर यजीद के पास भेज दो ।

मगर हुसैन के सामने वलीद मे भी इतनी हिम्मत नहीं थी की वो हुसैन को कुछ भी कह सके ।

इधर सारी बाते पता चलने पर यजीद आपकी जान का दुश्मन बन बैठा I और इनामो इकराम का लालच देकर हुक्म दिया की अगर हुसैन बैत नहीं करते है तो जो कोई उन्हे कत्ल कर देगा उसे बेशकीमती तोहफ़े के साथ ऊंचा दर्जा भी दिया जाएगा ।

क्रमशः

🖊️तालिबे इल्म : एड. शाहिद इक़बाल ख़ान, चिश्ती- अशरफी

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