ReligionSpecial All time

ज़िक्र ए शोहदा ए कर्बला🖊️ पार्ट -11

– दीं पनाह अस्त हुसैन-
🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️

🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️
🔥यौम ए आशूरा 🔥
🌄🌄🌄🌄🌄🌄🌄🌄

दश्त-ए-बाला को अर्श का जीना बना दिया, जंगल को मुहम्मद का मदीना बना दिया।
हर जर्रे को नजफ का नगीना बना दिया, हुसैन तुमने मरने को जीना बना दिया।

शहादत हज़रत अबुल फ़ज़लिल अब्बास बिन अली

कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की तरफ अलम उठाने वाले हज़रत अब्बास अलमदार थे । कर्बला मे इमाम हुसैन के साथ क्या कुछ ज़ुल्मो सितम नही किए गए। आख़िर उनकी गलती क्या थी । एक तरफ़ ज़ालिम फासिक यजीद का साथ देने वाले थे तो दूसरी तरफ इमाम हुसैन का साथ देने वाले ।

इमाम हुसैन की अज़मत को कौन नही जानता था फ़िर भी उनसे जंग करने एक बहुत बड़ी सेना सामने थी जिनसे मुकाबला करने इमाम हुसैन के साथ सिर्फ़ 72 साथी थे, जिनमे हुसैन के घराने के अलावा उनके खादिम(सेवक) और जानिसार साथी साथ थे जो कूफे वालो के कहने पर मेहमान बनकर आए थे ना की जंग करने ।

अब्बास अलमदार के हाथो में हुसैनी अलम यानि झण्डा था । अब्बास उस शेर का नाम है, जिससे दुश्मन थर थर कांपते थे, जो हुसैन इब्ने अली के चहेते भाई थे I
हज़रत अब्बास बेहद खूबसूरत थे, इसलिए उनको कमर-ए-बनी हाशिम (हाशिमी कबीले का चाँद) भी कहा जाता है I
इमाम हुसैन की माँ हज़रत फ़ातिमा रदीअल्लाहू अन्हुम के बाद हज़रत अली से जब लोगो ने निकाह करने कहा, तब आपने अपने भाई हज़रत अक़ील से कहा की में किसी ऐसे खानदान की लड़की से ही शादी कर सकता हूँ जिसका नाम अरब के बड़े बहादुरों में शुमार होता हो, ताकि बहादुर और जंग-आज़मा(युद्ध में निपुण) औलाद पैदा हो I

हज़रत अक़ील ने कहा की उम-उल- बनीन- ए- कलाबिया से शादी कीजिए. उनके बाप दादा से ज़्यादा बहादुर सारे अरब में नहीं है ।
हज़रत अली ने तब जनाबे उम-उल-बनीन से शादी की और उनसे चार बेटे पैदा हुए । हज़रत अब्बास उनमें सबसे बड़े थे. वह इमाम हुसैन को बेहद चाहते थे ।

हज़रत अब्बास के हाथों में ही अलम(ध्वज) था. इसीलिए उन्हें अलमदार-ए-हुसैनी कहा जाता है

उनकी बहादुरी सारे अरब में मशहूर थी. कर्बला मे जब उन्होने मासूम अली असगर के सूखे होठो को देखा और सकीना को प्यास से तड़पते देखा, तो वो बेचैन हो उठे, और तब उन्होंने भाई हुसैन से कहा

मौला हुसैन मुझे मश्कीज़ा दो जंग करने से पहले मै बच्चो के लिए पानी लेकर आता हूँ और फिर इस यज़ीदी लश्कर की जम कर खबर लेता हूँ I

  • इमाम हुसैन ने कहा भाई अब्बास तुम्हें मै कैसे इजाज़त दे सकता हूँ तुम तो हुसैन की ताकत हो अगर तुम्हें कुछ हो गया तो हुसैन की कमर टूट जाएगी ।

अब्बास ने कहा :

मौला सकीना की प्यास मुझसे देखे नहीं जाती । अगर उन्होने हमला किया भी तो ये अब्बास उन्हे खत्म करने के लिए अकेला ही काफी है।

और फिर इस तरह भाई हुसैन से इजाज़त लेकर अब्बास नहरे फुरात की तरफ बढ़ने लगे उनके एक हाथ में अलम था तो दूसरे हाथ में मश्क़ वे इस तरह आगे बढे जैसे की नदी की तरफ जाने के लिए रास्ता बना रहे हों । हज़रत अब्बास को यूं आगे बढ़ता देख यजीद की सेना इस तरह डर कर भागीं जैसे की शेर को देख कर भेड़ बकरियां और हिरण भागते हैं I हज़रत अब्बास अपने घोड़े पर नहरे फुरात तक पहुँच गए, यहाँ तक की उनके घोड़े के अगले दो पैर पानी के अंदर थे ।

अब्बास ने मश्क़ में पानी भरा और चुल्लू में पानी लिया और सोचा चलो अपनी प्यास बुझा ले मगर फिर ख्याल आया 4 साल की बच्ची सकीना प्यासी है, मासूम अली असगर प्यासा है, भाई हुसैन के गले से नीचे पानी नहीं गया है तो फिर भला वो किस तरह पानी पी ले और आपने चुल्लू का पानी वापस दरिया में डाल दिया और पानी नहीं पिया ।

फ़िर इसके बाद उन्होने घोड़े से कहा

तू भी तो प्यासा है, पानी पी ले।

मगर घोड़े ने भी पानी नहीं पिया । ये थी मोहब्बत इंसान तो इंसान जानवर तक को भी पानी पीना गवारा न था । सुभान अल्लाह ।

हज़रत अब्बास ने पानी का मश्क अपने बाये कंधे पर रखा I जब वापस लौटने लगे तो इब्ने ज़ियाद चिल्लाया

अगर अब्बास ने और हुसैनी सेना ने पानी पी लिया तो फिर तुम सबको मरने से कोई नहीं बचा सकता वो लोग तुम सभी को किसी गाजर मुली की तरह से कट देंगे I
सब मिल कर एक साथ अब्बास पर हमला कर दो ।

जिसे सुनकर भागी हुई फ़ौजें फिर से जमा हों गईं और हज़रत अब्बास पर चारो तरफ से तीरों की बारिश कर दी जिसके बावजूद अब्बास पानी लेकर बढ़ते रहे और यज़ीदियो को गाजर मूली की तरह काटते रहे । फ़ौजों को खदेड़ते हुए वे आगे बढ़ते रहे तभी पीछे से एक ज़ालिम ने हमला करके उनका बांया बाज़ू काट दिया ।

आपने मश्क अपने दाहिने कंधे में रखा और एक हाथ से लड़ते हुवा आगे बढ़ने लगे अभी वह कुछ क़दम आगे बढे ही थे कि पीछे से वार करके उनका दूसरा बाज़ू भी काट दिया गया ।

हज़रत अब्बास ने मश्क़ अपने दांतों में दबा लिया. और आगे बढ़ते गए, इसी बीच एक ज़ालिम ने मश्क़ पर तीर मार कर सारा पानी ज़मीन पर बहा दिया ।

और इस तरह जालिमो ने प्यासे बच्चों तक पानी पहुँचने नहीं दिया और तभी बहोत से ज़ालिम यज़ीदी सिपाहियों ने हज़रत अब्बास को चारो तरफ से घेर लिया और उनके सर पर गुर्ज़ (गदा) मारकर कर गिरा दिया जब अब्बास खेमें में नहीं पहुंचे तो हुसैन उन्हें ढूंढ़ते हुवे वहां आए तो देखा अब्बास के दोनों बाजू कटे है एक आंख में तीर धसा हुआ हुसैन चीख उठे

हाय अब्बास तुमने भी हुसैन का साथ छोड़ दिया।

अब्बास कराह उठे और कहा

भाई मेरी आंख से तीर तो निकालो ताकि मै आखिरी बार तुम्हे देख सकू।

हुसैन ने तीर निकाला और भाई अब्बास का सरे मुबारक अपनी गोद में रखा अब्बास ने आंखें खोली और हुसैन का चेहरा देख कर खुश हुए और फिर फरमाया

मैं सकीना की लिए पानी नहीं ले जा सका मैं सकीना से किस तरह नज़र मिला सकता हूं भाई मुझसे वादा करो मेरा लाशा खेमें में लेकर नहीं जाओगे ।

हुसैन की आंखों से अश्कों का सैलाब बह उठा

हुसैन ने जब वादा किया तो अब्बास अलमदार ने अपनी आंखे हमेशा हमेशा के लिए बन्द कर ली
(इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैही राजेउन)

हज़रत अब्बास को इसी वजह से
सक्का-ए-सकीना (सकीना के लिए पानी का इंतज़ाम करने करने वाले) के नाम से भी याद किया जाता है I
जहाँ कही भी आज मुहर्रम के दौरान जुलूस निकलता हैं, उसमे जो अलम होता है वह हज़रत अब्बास की ही निशानी हैं.

हज़रत क़ासिम बिन हसन की शहादत :

हज़रत क़ासिम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बड़े भाई इमाम हसन के बेटे थे । उस समय उनकी उम्र लगभग तेरह साल थी I चचा अब्बास अलमदार के शहीद होने पर आपका खून खुल उठा आप चचा हुसैन के पास आये और कहा

बाबा हसन ने मेरे बाजू में एक तावीज़ बाँधा था और कहा था बेटे जब कभी सख्त परेशानी आ जाये तो इस तावीज़ को खोलकर अपनी आँखों से लगा लेंना I

मैंने इस तावीज़ को आज जब खोल कर देखा तो उस पर लिखा था की भाई हुसैन के साथ तुम्हे भी दींन की हिफाज़त करने जाना पड़ा तो उनसे पहले तुम्हें अपनी कुर्बानी देनी होगी, लिहाज़ा चचाजान ये बाबा का हुक्म है मुझे आप यज़ीदी सिपाहियों का सामना करने जाने दे।

आपने कहा

अए बेटे तुम मेरे भाई हसन की निशानी और वारिस हो अभी तो तुम्हे दूल्हा बनना है तुम्हे मै जंग में जाने की इजाज़त भला किस तरह से दे सकता हूँ
तुम्हें देखता हूँ तो मुझे भाई हसन नज़र आते है तुम्हारे चेहरे को देखता हूँ तो नाना जान का नूरानी जलवा नज़र आता है ।
मगर आपने जवाब दिया

चचाजान मेरी रगों में बाबा हसन और दादा अली का खून है, आप मुझे इजाज़त दे I

और फिर इमामे आली मकाम हुसैन अलैहिस्सलाम से इजाज़त लेकर जब ये शेर यज़ीदी फौज मे गया तो इस शेर की तलवार के जौहर से यज़ीदी पीछे हट गए, इतनी कम उम्र में भी हज़रत क़ासिम ने इतनी हिम्मत और बहादुरी से लड़ाई लड़ी कि यज़ीदी फ़ौज के बड़े बड़े सूरमाओं के भी छक्के छूट गए।

क़ासिम की बहादुरी देख कर अम्र बिन साअद जैसे बड़े पहलवान को हज़रत क़ासिम के सामने आना पड़ा जिसके बारे में ये मशहूर था की वो एक हज़ार की फौज पर अकेले ही काबू पा सकता था मगर वो भी क़ासिम पर काबू ना पा सका, काफ़ी सैनिकों ने कासिम को घेर लिया तो मौका पाकर इस बदबख्त ने हज़रत क़ासिम के सर पर तलवार मार कर उन्हें शहीद कर दिया ।
(इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैही राजेउन))


  • हज़रत अली अकबर बिन हुसैन की शहादत

क़ासिम की शहादत का इमाम हुसैन को इस कदर रंज हुआ कि इमाम खुद ही तलवार लेकर अपने भतीजे के क़ातिल कि तरफ झपटे,

उधर से दुश्मन कि फ़ौज ने कासिम के क़ातिल को बचाने के लिए घोड़े दौडाए, और ज़ालिमो ने हज़रत कासिम की लाश को भी घोड़ो से पामाल कर दिया।

इस तरह कासिम के साथ ही इमाम ए आली मकाम हुसैन के चश्मों चिराग़ उनका नवजवान बेटा अली अकबर जो उस वक्त महज़ 18 साल के थे, जिसकी बलाये लेते हुसैन नहीं थकते थे, उन्होंने भी जंग में अपने जौहर दिखाने की इजाज़त बाबा हुसैन से मांगी थी।

हुसैन से किस तरह इजाज़त दी होगी ये तो सिर्फ़ हुसैन ही जानते होगें

जब वे तैयार हुवे थे तो हुसैन ने नाना जान का अमामा बेटे के सर पर बांधा
जैनब ने कपड़े की पोटली निकाली और उसमे से एक दुपट्टा निकाला जिसमे 17 पैबंद लगे हुवे थे और कहा ‘ ये अम्मी फातिमा की निशानी है कहते हुवे अली अकबर की कमर मे बांधते हुए जंग मे जाने के लिए उन्हे रुखसत किया ।

हुसैन ने एक आखरी नजरों से बेटे अली अकबर को देखा उसके माथे को चूमा और शमशीरे हैदरी बेटे के हाथो मे देकर कहा

जा बेटा हौजरे कौसर के पास नाना जान जामे कौसर लेकर तेरा इंतज़ार कर रहे ।

अली अकबर ने बाबा हुसैन को देखा और फिर घोड़े पर सवार होकर दुश्मनों की तरफ किसी बिजली की मानिंद झपटे । जिस तरफ भी अली अकबर निकल जाते थे उधर तहलका मच जाता था और लाशो के ढेर लग जाते थे कासिम और अली अकबर यज़ीद की पूरी सेना पर भारी थे अगर वे दायी तरफ चले जाते तो दाईं तरफ वालो को किसी गाजर मूली की तरह काट देते है और अगर जब बायीं तरफ निकल पड़ते तो बायीं तरफ वाले दुश्मनों का काट देते थे ।

और फिर लड़ते लड़ते ही हज़रत अली अकबर हुसैन के पास भी आए और कहा

बाबा बस एक घूट पानी का मिल जाए तो मै दुश्मनों के छक्के छुड़ा दूंगा। बाबा हुसैन ने लहूलुहान बेटे को चूमा और अपनी ज़बाने मुबारक अली अकबर को चुसाई ,
अली अकबर ने देखा की बाबा की ज़ुबान भी पूरी तरह सूख चुकी है, अली अकबर फिर दोबारा मुक़ाबला के लिए दुश्मनों के लश्कर मे घुस गए और फिर उन्हे गाजर मूली की तरह काटना शुरू कर दिया मगर वे आखिर कितनी देर हजारों का मुक़ाबला कर सकते थे, सैकड़ो तीर उनकी पीठ पर पेवस्त थे और आखिरकार हुसैन का ये लाल भी जंग में शहीद हो गए ।
(इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैही राजेउन)

इमाम हुसैन के सब्र का आलम तो देखे उनहोने अली अकबर और कासिम की लाशो को किस तरह देखा होगा। इन दोनों शेरो की लाशो को हुसैन नेसाथ साथ ही रख दिया I

इमाम हुसैन ने हाथ उठाकर रब से फरमाया

या अल्लाह हुसैन के घराने के इन नौ निहालो की कुर्बानी कुबूल फरमा

मासूम अली असग़र की शहादत :

इमाम हुसैन ने कर्बला मे एक ऐसी कुर्बानी भी पेश की जिसकी मिसाल रहती दुनिया तक मिलना मुमकिन नहीं।

हज़रत अली असग़र पानी न होने के वजह से प्यास से बेहाल थे। पानी न मिलने के कारण अली असग़र की माँ जनाबे रबाब का दूध भी खुश्क हो गया था। तब इमाम हुसैन ने सोचा इस बच्चे के लिए पानी मांगे लिहाजा अपने छह महीने के बच्चे हज़रत अली असग़र को लेकर मैदान में आए।

हज़रत अली असग़र के लिए इमाम हुसैन ने दुश्मनो से पानी मांगा तो आवाज़ आई

हुसैन अब भी तुम्हारे पास वक्त है यजीद की बैत स्वीकार कर तो इस बच्चे को पानी मिल सकता है
हुसैन ने जवाब दिया उस फासिक को बैअत हुसैन को किसी कीमत पर मंजूर नहीं।

जिसके बाद हुर्मलाह नाम के एक बदबख़्त तीर अंदाज़ ने मासूम अली असग़र के गले पर तीर मारा वो भी तीन नोकों वाला वो तीर जो अमूमन घोड़ो को मारने के लिए मारा जाता है

जिसने इस बात को साबित कर दिया की इमाम हुसैन से लड़ने वाले लश्कर मे इंसानियत थी ही नहीं उन्होने तो हैवानियत की सारी हदे पार कर दी थी ।

हुसैन ने देखा की तीर लगने के बाद भी मासूम अली असगर की मुठ्ठिया खुल और बंद हो रही थी मानो कह रहे हो

इन हाथो में भी तलवार होती तो वो भी यज़ीदी सेना के छक्के छुड़ा देता ।

हुसैन के हाथो मे जिस्म मे बेटे अली असगर का खून था, उनके हाथो के चुल्लू मे खून था,

हुसैन ने जब ये खून ज़मीन पर डालना चाहा तो निदा आई

ए हुसैन अगर ये खून ज़मीन मे गिर गया तो ज़मीन मे कभी अनाज या कोई पैदावार कभी नहीं होगी।

हुसैन ने जब इसे आसमान की तरफ उछालना चाहा तो निदा आयी

हुसैन गर ये खून आसमान की तरफ उछला तो कभी आसमान से बारिश नहीं होगी पानी की जगह खून के कतरे बरसेंगे ।

तब इमामे हुसैन ने इस खून को अपने सर चेहरे मुबारक मे मल लिया ।
और रब की बारगाह मे हाथ उठाकर फरमाया

या अल्लाह मेरे मासूम अली असगर की कुर्बानी को कुबूल फरमा

रिवायतो मे आया है की इमाम हुसैन जब कर्बला मे आए थे तो उनके बाल काले थे आज बेटे अली असगर को लेकर जब हुसैन खेमे मे आए तो उनके सर और दाढ़ी के बाल सुफेद वो खून आलूदा हो चुके थे ।

अली असगर की लाश को देखकर शहरबानो, और हुसैनी घराने की सभी औरतों पर क्या बीती होगी। उन्होने किस तरह सब्र किया होगा और किस तरह अली असगर को गोद मे लेकर अपने लाल का चेहरा देखा होगा । इसे तो वे ही जानते होगें।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
और इस तरह कर्बला मे हुसैन के बाग का ये नन्हा शहजादा मासूम अली असगर ने भी शहादत का जाम पी लिया ।

(इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैही राजेउन)

🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️

इमाम ए आली मकाम हुसैन अलैहिस्सल्लाम की शहादत
🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️

हज़रत अली असग़र की शहादत के बाद पैग़म्बरे इस्लाम का चहीता नवासा, हज़रत अली का शेर, जनाबे फातिमा का दुलारा और हज़रत हसन के बाज़ू की ताक़त यानी हुसैन-इब्ने अली कर्बला के मैदान में तन्हा और अकेला रह गए थे

एक एक कर न जाने कितने ही लाशा अपने हाथो में उठाने वाले हुसैन का सब्र तो देखिए ।

चेहरे मे अली असगर के खून की लालिमा थी, माथे पर अली असगर और कासिम का खून था

हाथों मैं भाई अब्बास के खून की बूंदे चमक रही थी,खुश्क ज़ुबान में छाले थे ।

55 साल 5 माह और 5 दिन की उम्र में अपने 71 अज़ीज़ों और साथियों की लाशें उठाने के बाद भी क़दमों का ठहराव और हुसैन का सब्र कह रहा था की आज हुसैन ने अपना हक़ अदा कर दिया है।

नानाजान के दींन की खातिर एक एक करके ये कुरबानिया पेश करने के बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, खेमे में आये, अपनी बहनों जनाबे जैनब और जनाबे उम्मे कुलसूम को रोता देख उन्हें गले से लगाया और कहा

ए बहन जैनब अभी-अभी नाना जान नज़र आए उनके हाथों में जामे कौसर का प्याला था।

वे कह रहे थे बेटा हुसैन बस तुम्हारे सब्र का इम्तेहान पूरा हुआ अब मेरे पास चले आओ बेटा

हुसैन की इतनी बाते सुनकर जनाबे जैनब रोने लगी, सभी के सब्र का बांध टूट गया और खेमे में मौजूद सभी रोने लगे ।

हुसैन ने बहन जैनब से कहा

ए बहन जैनब, भाई अब्बास, और भाई हसन की आंखो का तारा कासिम नहीं रहा ।

बेटा अली अकबर और मासूम अली असगर भी चले गए।

बहन ज़ैनब तुम्हारे जिगर के टुकड़े औन ओ मोहम्मद भी नहीं रहे।

मेरी बहन फख्र है मुझे सभी पर, सबने इस हुसैन की लाज रख ली।

सुनकर जैनब रोने लगी, तो हुसैन ने कहा

ए हुसैन की बहनों अब रोना बंद कर दो, तुम अब गवाह हो जाओ तुम्हारा ये भाई अब अपने इम्तिहान की आखिरी मंज़िल पर हैं ।

और इस मंज़िल से भी ये हुसैन बहोत ही आसानी से गुज़र जाएगा। लेकिन
तुम्हें अभी मुश्किल मंज़िलों से गुज़रना बाकी है ।

सब्र से काम लेना क्योकि अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है ।

फ़िर उसके बाद इमाम हुसैन बेटे सज्जाद अली इब्नुल हुसैन यानि इमाम ज़ैनुल आबिदीन के पास आये जो की इस वक्त भी तेज़ बुखार में नीम बेहोशी के आलम में थे। उन्हे दवा मिलना तो दूर गले के नीचे एक कतरा पानी भी नही मिल सका था।

इमाम हुसैन ने बीमार बेटे का कन्धा हिलाया बेटे ने आँख खोली सामने बाबा जान का चेहरा था बीमार ज़ैनुल आबिदीन ने उठना चाहा हुसैन ने बाज़ू थाम कर सीने से लगाया ।
जो इल्म सीना ब सीना चला आ रहा था उसे हुसैन ने बेटे ज़ैनुल आबिदीन के सीने मे उतार दिया ।

ज़ैनुल आबिदीन के बीमार जिस्म मे तवानाई आ गयी । दिल पुरनूर हो उठा ।

ज़ैनुल आबिदीन ने होश मे आने पर खेमें में नज़र घुमाई किसी को पास नहीं देखा तो अपने बाबा हुसैन से पूछा कि

अए बाबाजान सारे मददगार, नासिर और अज़ीज़ कहाँ चले गए?”।

भाई अली अकबर कहाँ है, ?

कासिम कहाँ है ? और मेरा भाई अली असगर का झूला ख़ाली क्यों है ?

कहा है मेरा भाई असगर ?

सुनकर ख़ेमे में सभी रोने लगे इस पर इमाम हुसैन की आंखे भी नम हो उठी और गला रूंध गया ।

हुसैन ने बेटे से सब्र रखने कहा और कहा

बेटे, सब अपनी जान लुटा चुके हैं। सभी शहादत का जाम पी चुके है । इस वक़्त यहां सिर्फ़ हम दोनों है ।

और फिर बेटे से कहा तुम्हारा ये बाबा भी अब अपने आखरी सफर पर अपनी कुर्बानी पेश करने जा रहा है ।

*सुनकर ज़ैनुल आबिदीन की रगों में दौड़ने वाला खून शोला हो उठा उनका बीमार जिस्म कांप उठा । उन्होंने कहा कि अभी मै बाक़ी हूँ, बाबा जान.. मेरे होते हुवे आप मैदान में नहीं जाएँगे मुझे इजाज़त दीजिये ।

इमाम हुसैन ने कहा कि

बेटे तुम्हें बाकी रहना है क्योकि हुसैन की नस्ल तुमसे ही आगे बढ़ेगी । तुम्हें अभी कड़ी मंजिलों से गुज़रना है मगर तुम्हारा जिहाद दूसरी तरह का है ।

और इस तरह हुसैन ने किसी तरह बेटे को समझाया और दिलासा दिया ।

इमाम हुसैन ने बतला दिया रब ने जिसे चाहा हुसैन ने उसकी कुर्बानी पेश कर दी ।और जिसे रब ने बचाकर रखना चाहा कोई उसका बाल भी बांका नहीं कर सका और यह बात हुसैन जानते थे

तभी हुसैन ने आहट सुनी खेमे से बाहर देखा तो पाया एक ऊंट पर सवार होकर कोई तेज़ी से हुसैनी खेमे की तरफ आ रहा है ।

हुसैन ने तलवार निकाल ली वो एक बूढ़ा था । खेमे के करीब आकर वो ऊंट से उतर पड़ा हुसैन को देखकर उसकी आंखो मे चमक आ गयी । आने वाले ने सवाल किया

क्या आप हुसैन इब्ने अली है ?

जब हुसैन ने हाँ कहा तो उस बूढ़े ने आपके हाथो का बोसा लेकर कहा मै मदीने से आ रहा हूँ । मै आपकी बेटी सुगरा का तोहफा और खत लेकर आया हूँ । बेटी सुगरा का नाम सुनकर हुसैन तड़प उठे और पूछा

ए बुजुर्ग ए मोहतरम आप सुगरा से कब मिले ?

तो उस बूढ़े ने कहा

जब मै मदीने शरीफ मे नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम यानि आपके नाना जान की बारगाह मे कुछ दिन कयाम किया तो देखा की एक बच्ची पर्दे मे रोजाना आती और आक़ा ए करीम से बात किया करती उनसे शिकायत करती और कहती

देखो बाबा मुझे अपने पास नहीं बुला रहे है वे मेरी कोई सुध भी नहीं ले रहे है ।

जब मैंने उसके मुख से कुफ़े का नाम सुना तो कहा ‘ अये बेटी मै कुफ़े जा रहा हूँ अगर तुम्हें कुछ पैगाम देना हो तो मुझे बतला दो जिसे सुनकर बेटी खुश हो गयी और फिर वो दौड़कर घर गयी और ये खत और कुछ सामान ले कर आई और कहा

क्या आप मेरे बाबा से मिलेंगे?

जब मैंने हां कहा तो उसने कहा

इसे बाबा हुसैन को दे देना ।

हुसैन ने पूछा आप मुझ तक किस तरह पहुचे ।

उस बूढ़े ने कहा मैंने देखा एक तरफ बहोत से लोगो का हुजूम है इससे पहले की मै आपके बारे मे किसी से कुछ पूछता मेरी ये ऊटनी अचानक ख़ुद ही दौड़ पड़ी जो लाख रोके नहीं रुक रही थी फिर इसने ही मुझे सीधा लाकर आपके सामने खड़ा कर दिया ।

सुनकर हुसैन उस ऊंटनी के करीब आए तो उसने अपनी गर्दन हुसैन के कदमो मे झुका दी हुसैन ने उसे थपथपाया ।

और फ़िर इस तरह इमाम हुसैन ने उस बूढ़े को इनाम देकर बिदा किया । और फिर जब खेमे मे आए तो जैनब को वो पोटली देकर कहा बेटी सुगरा ने खत और इसे भिजवाया है।

सबके सामने जब इस पोटली को खोला गया तो सबने देखा की उसमे मासूम अली असगर के कपड़े थे । फ़िर हुसैन ने बेटी सुगरा का खत खोला और पढ़कर सभी को सुनाया लिखा था

‘अये भाई अली अकबर मै तुझसे बहोत नाराज़ हूँ तुमने मुझसे वादा किया था की मुझे लेने जल्द आओगे मगर तुम नहीं आए । बाबा और फ़ुफ़्फ़ी भी मुझे भूल गयी ।

मेरा भाई अली असगर कैसा है ? उसकी बहोत याद आती है उसके लिए मैंने अपने हाथो से कपड़े बनाए है उसे पहना देना ।

और न जाने कितनी ही शिकायते लिखी थी सुगरा ने । हुसैन खत पढ़ते जाते और सभी रोते चले जाते ।

लगा जैसे जैनब के सब्र का बांध टूट जाएगा जैनब और दूसरी औरतों ने मुंह मे दुपट्टे भीच लिए मगर आँसू थे की वो थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे ।

और फिर इसके बाद इमाम हुसैन ने एक खादिमा को ख़ामोशी से एक संदूक लेकर आने कहावह खादिमा संदूक लेकर जब आने लगी तो हजरत जेनब ने उससे पूछा कि इसे कहां ले जा रही हो तो उसने कहा

आका मौला हुसैन ने मंगवाया है।

जेनब ने कहा लाओ इसे मैं लेकर जाती हूं और वह इस संदूक को लेकर हुसैन के पास आई और कहा भाई अम्मी फातिमा ने इस संदूक को संभाल कर रखने कहा था और ये भी कहा था बेटी इसमें जो कपड़े है जब हुसैन सख़्त इम्तेहान मे हो और उन्हे जंग में जाना पड़े तो अपने हाथों से उन्हे देना। कहकर जैनब ने संदूक खोला और सभी सामान भाई हुसैन को दिया।

इमाम ए आली मकाम हुसैन ने सर पर अपने नाना का साफ़ा बांधा ।
बाबा अली की शमशीर मयान में रखी और जाफर ए तैय्यार का पट्टा कमर में बांधा

और फिर सभी घरवालों को आखरी बात समझाने के बाद जंग के मैदान में जाने लगे तो बहन जैनब ने कहा

भाई हुसैन सभी को आपने मैदान ए कर्बला में मुक़ाबला करने भेजा है आज मैं आपको रुखसत करने बाहर आना चाहती हूं ।

हुसैन ने कहा

बहन जैनब तुम्हे हौसला रखना होगा, सभी को संभालना होगा बहन तुम खेमें में ही रहो ।

अल्लाह तुम सबकी हिफाज़त करेगा ।

और फिर हुसैन घोड़े पर सवार होकर जब आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे तो देखा की घोड़ा रुक गया है और आगे ही नहीं बढ़ रहा तो हुसैन ने घोड़े से प्यार से कहा

बस कुछ देर और हुसैन का साथ दे दे फिर जहां दिल चाहे वहां चले जाना।

मगर घोड़ा फिर भी आगे नहीं बढ़ा और वो गर्दन से पीछे की तरफ इशारा करने लगा तो हुसैन ने देखा की सकीना ने घोड़े के पैर को पकड़ रखा है।

हुसैन घोड़े से नीचे उतरे और सकीना ने कहा

बाबा मैं आपको नहीं जाने नहीं दूंगी। जो भी जंग में गया है वह वापस नहीं आया । आप भी नहीं आए तो सकीना किसके कांधो पर सर रख कर सोएगी।

हुसैन जमीन पर बैठ गए और सकीना अपने बाबा के कंधों पर सिर रखकर लेट गई हुसैन उसे समझाते रहे तब फिर कुछ देर बाद सकीना चुप हो गई उसने आंसू पोछे और कहा

ठीक है बाबा आप जाए ।आप दुश्मनों से जंग करे और उन सबको खत्म कर दें जिन्होंने मेरे भाईयो को और चचा अब्बास को मारा है ।

और फिर इस तरह हुसैन जंग के मैदान में आये ऐसे हाल में जब की कोई मददगार और साथी नहीं था फिर भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने एक आखरी खुतबा देकर उन्हे आगाह किया और कहा

मैंने अपने भाई को कुर्बान किया भतीजे को कुर्बान किया बेटे को कुर्बान किया यहाँ तक की 6 महीने के अली असगर को भी तुमने मार डाला फिर भी हुसैन तुमसे वादा करता है की अगर तुम राहे हक मे आ जाओ तो ये हुसैन तुम्हारी बख्शीश के लिए दुवा करेगा और तुम्हें जहन्नम की आग से बचा लेगा । सुनकर सभी ख़ामोश हो गए, हुसैन की आवाज की लरजिश से सभी सहम उठे। हुसैन ने आगे कहा

क्या तुमने मुझे नाना की गोद मे नहीं देखा था यहाँ तक की हालते नमाज़ मे मुझे उनकी पुश्त पर बैठे नहीं देखा था की नानाजान तब तक सजदे से नहीं उठते जब तक मै नहीं उठ जाता, क्या तुमने मुझे उनके कंधो पर बैठे नहीं देखा ? *

उनमें से कुछ लोगो ने कहा*

हाँ हुसैन हमने ये सब अपनी आंखो से देखा है ।*

हुसैन ने कहा

तो फिर ये बताओ की हक पर कौन है ।

लोग खामोश हो गए ।

हुसैन ने कहा क्या तुम्हारी तलवारों की प्यास इतनी सारी कुर्बानियों के बाद भी नहीं बुझी है जो मुझे मारकर जहन्नम मे जाना चाहते हो ।

खुतबा का प्रभाव होता देख कर यज़ीदी कमांडर शिम्र ने कहा ‘

हुसैन तुम ज़िद क्यो करते हो अब भी यजीद की बैत स्वीकार कर लो तुम्हारी जान नहीं जाएगी । या फिर मुक़ाबला करो ।

हुसैन ने कहा

अरे बदबख़्त जिनहे हक़ नज़र नहीं आता उसका अंजाम बीक्या होना है क्या तू नही जानता ?

यजीद अगर हक़ पर होता तो ये हुसैन खुशी से उसकी बैत स्वीकार कर लेता मगर वो राहे हक़ पर नहीं है बल्कि वो दीन का दुश्मन है उसके नापाक हाथो पर बैत हुसैन को किसी कीमत भी पर मंजूर नहीं।
यह हुसैन अपना सर तो कटा सकता है मगर उस जालिम यज़ीद के हाथों पर बैत कभी नहीं करेगा।

सुनकर शिम्र ने सेना को इमाम हुसैन पर हमला करने का हुक्म दिया ।

इमाम ने जवाबी हमला करने से पहले भी दुश्मनों को सावधान किया और फिर जब दुश्मनों ने उन्हें चारो तरफ से घेर लिया तो फिर इमाम आली मक़ाम ने भी वो जौहर दिखाये की यज़ीदी सेना के पैर उखड गए ।
वह शेर की तरह झपट रहे थे और यज़ीदी फ़ौज के टट्टू जल्द ही अपनी जान बचाने इधर उधर भाग रहे थे।
किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी की वह अकेले बढ़ कर इमाम हुसैन पर हमला करता। बड़े बड़े सूरमा दूर खड़े हो कर जान बचा कर भागने वालों का तमाशा देख रहे थे। इस हालत को देख कर यज़ीदी फ़ौज का कमांडर शिम्र चिल्लाया

खड़े हुए क्या देख रहे हो ? हुसैन को क़त्ल कर दो, तुम्हे इसका बड़ा इनाम मिलेगा”।

इसके बाद फिर से सारी फ़ौज के सैनिकों ने मिल कर चारों तरफ से इमाम ए आली मकाम पर हमला कर दियाहुसैन के हाथों मे अली की तलवार थी, लगा जैसे अली मैदान में आ गए है, जिस तरफ शमशीर उठ जाती उस तरफ हाहाकार मच जाता । दुश्मन गाजर मूली की तरह कटते नज़र आते।

और फिर इसके बाद इमाम के कानो में एक सदा सुनाई दी

अए हुसैन रुक जाओ वरना कज़ा आ जाएगी, जन्नत तुम्हारी मुन्तजिर है,
अए हुसैन आओ अब बागे जन्नत में आ जाओ जामे कौसर तुम्हारे इंतज़ार में मुन्तजिर है ।
हुसैन इब्ने अली आओ अब जन्नत में चले आओ I

और फ़िर सदा ए अज़ा की गैबी आवाज़ इमाम आली मकाम हुसैन के कानो में पहुंची

हुसैन ने देखा की नमाज़ का वक्त हो गया तो हुसैन रुक गए,

वो हुसैन जिसे दुनिया की कोई ताकत जिस्मों मे बेहिसाब घाव होने के बावजूद भी नहीं रोक सकती थी उसे नमाज़ ने रोक दिया

गोया की रब ने भी फरमा दिया के बास हुसैन अब रूक जाओ तुम अपने इम्तेहान मे कामयाब हुए।

और हुसैन इब्ने अली घोड़े से उतर गए।

यजीदी सेना के पैर उखड़ चुके थे सिपाही जान बचाकर भाग रहे थे

हुसैन को सजदे में देख
शिम्र चिल्लाया

यही मौका है। हुसैन पर सब मिलकर हमला कर दो यजीद तुम्हे मालामाल कर देगा।

और फिर हर तरफ से तलवारों, तीरों और नैज़ों की बारिश होने लगी ।

सैंकड़ों ज़ख्म खाने के बाबजूद इमाम ए आली मकाम हुसैन ने नमाज़ की नीयत की और सरे मुबारक रब की बारगाह मे सजदे मे आकर रब के बेहद करीब हो गए।

इधर इमाम सजदे मे थे की शिम्र ने फ़िर सैनिकों को हुक्म दिया यही सही मौका है इमाम को खत्म कर दो वरना वो तुम्हें खत्म कर देंगे और फिर इमाम का वो क़ातिल हुसैन के क़रीब आ गया ।
इधर इमामे ए आली मकाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी रब की बारगाह में आखरी सजदा किया और इस वक्त वो रब के रूबरू थे, और रब भी हुसैन की शहे रग से भी ज़्यादा क़रीब था
तभी इमामे आली मकाम का सर ए मुबारक उनके जिस्म से जुदा करने के लिए शिम्र आगे बढ़ा और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की गर्दन पर तलवार का वार कर उनके सर ए मुबारक को जिस्म से जुदा कर दिया I

अपने बाबा अली की तरह इमाम हुसैन पर भी ज़ालिमो ने सजदे के वक्त हमला किया।

और इस तरह दीन को पनाह देने वाले नबी के नवासे अली और फातिमा के दुलारे इमाम ए आली मक़ाम हुसैन अलैहिस्सलाम शहीद हो गए।

(इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैही राजेउन)

उस यज़ीदी कुत्ते शिम्र ने खुश होकर इमाम आली मक़ाम हुसैन के सर ए मुबारक को नेजे की नोक में रखा वो सरे मुबारक जिसकी पेशानी को नाना जान चूमा करते थे, जिन्हें सैय्यदा फातिमा अपनी गोद में रख कर बालो को सहलाया करती उस सरे मुबारक को वो ज़ालिम नेज़े मे रखा था और नेजे को आसमान की तरफ बुलंद कर खुश होकर बोला की देखो हमने हुसैन इब्ने अली को आखिरकार ख़त्म कर ही दिया I

मगर हुसैन ने दिखला दिया की देखो मैंने और मेरे घराने के साथ मेरे साथ चलने वालो ने शहीद होकर दीने मोहम्मदी को बचा लिया है, हुसैन ने अपना सर तो कटा दिया मगर अपना हाथ यज़ीद के नापाक हाथो में नही दिया ना ही जीते जी और ना ही मरने के बाद जिनके लिए रब ने भी मुकद्दस कुरान में फरमा दिया है

शहीद जिंदा है उन्हें मुर्दा ना कहोउनके मुर्दा होने का गुमान भी ना करो

बेशक इमाम आली मकाम हुसैन जिंदा है। और हमेशा जिंदा रहेंगे। जो आज नही समझ पा रहे है, इन शा अल्लाह कल वे भी हुसैन वाले हो जाएंगे।

ज़रा इंसान को बेदार तो हो लेने दो
हर कौम पुकारेगी **
*हमारे है हुसैन,हमारे है हुसैन

बेशक हुसैन ने इस्लाम को ज़िंदा किया ।
हुसैन दीन भी है और दी पनाह भी है ।
रब ने मुकद्दस कुरान मे जिस आयत में फ़रमाया

मै सब्र करने वालो के साथ हूँ।

अगर आप गौर करे तो कुरान की यह आयत सब्र से शुरू होकर सलात (नमाज़) मे ख़त्म हुई। जिसे आक़ा मौला हुसैन ने कर्बला मे प्रेक्टिकली दिखला दिया ।

कर्बला मे नमाज़ पढ़कर पर हुसैन ने नमाज़ की अजमत बतलाकर ये पैग़ाम भी दे दिया की बेशक नमाज़ मेरे नानाजान कि आंखो की ठंडक है ।

इससे आगे क्या हुवा । तमाम वाक्यात तफसीर से इन शा अल्लाह आगे की पोस्ट में समाद फरमाएंगे।

🖊️ तालिबे इल्म: एड.शाहिद इक़बाल ख़ानचिश्ती अशरफी

🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹🌲

Related Articles

Back to top button